-डा. ए. के. अरुण
सन् 2004 में जब बर्ड फ्लू फैला था तब अपने देश में ज्यादा ही अफरा-तफरी थी। देश ही नहीं पूरे महाद्वीप सहित लगभग दुनिया भर में हाय-तौबा मच गई थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) ने ‘रेड अलर्ट’ जारी कर दिया था। इस रोग के आंतक की वजह से एशियाई देशों को 50 करोड़ डालर से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ा था। इस बार भी धीरे-धीरे बर्ड फ्लू उसी अराजक स्थिति की तरफ बढ़ता प्रतीत हो रहा है।
इस बार भी बर्ड फ्लू के लिए वायरस एच 5 एन 1 को ही जिम्मेवार बताया जा रहा है। खबर है कि यह खतरनाक फ्लू वायरस बंगाल के अलावे बिहार, मेघालय, झारखण्ड, असम, त्रिपुरा, उड़िसा व अन्य प्रदेशों में भी पहुंच चुका है। हालांकि केन्द्र सरकार ने सभी प्रभावित क्षेत्रों में कोई 468 रैपिड रिस्पांस टीम भेज दी है जो ‘बर्ड फ्लू’ पर पैनी नजर रखे हुए है। आंकड़ों को देखें तो डब्लू.एच.ओ. के एपिडेमिक एण्ड पान्डेमिक एलर्ट एण्ड रिस्पान्स (ई.पी.आर.) के अनुसार 24 जनवरी 2008 तक भारत में बर्ड फ्लू से किसी व्यक्ति के मरने की खबर नहीं है जबकि इन्डोनेशिया में तीन संक्रमित व्यक्ति तथा वियतनाम मे एक कुल मिला कर चार के मरने की खबर है।
फ्लू वास्तव में एक तरह से श्वसन तंत्र का संक्रमण है। इस संक्रमण के लिए एन्फ्लूएन्जा वायरस का ए, बी तथा सी आदि टाइप जिम्मेवार होता है। इस संक्रमण में अचानक ठंड लगना, बदन दर्द, बुखार, मांशपेशियों में दर्द खांसी आदि लक्षण देखे जाते हैं। इसके कई प्रकार जैसे एच1 एन1, एच2 एन2, एच3 एन2 आदि कई बार दुनिया में तबाही मचा चुके हैं। इन वायरस के कहर से 1918-19 में लगभग 50 करोड़ लोग चपेट में आए थे जिन में से 2 करोड़ लोगों की तो मौत हो चुकी थी। इसमें कोई 60 लाख लोग तो भारत में मरे थे। उस समय इसे ‘स्वेन फ्लू’ का नाम दिया गया था। अब इस वायरस ने अपनी संरचना बदल ली है। वैज्ञानिकों की मानें तो इस नये फ्लू वायरस का प्ररिरोधी टीका बनाने में वक्त लगेगा। अब फ्लू वायरस ने अपनी संरचना बदल कर एच5, एन1 कर ली है। जाहिर है वायरस के तेजी से बदलने से इसके बचाव के उपायों को शीघ्र ढूढ़ना भी आसान नहीं है। ये वायरस महज महामारी ही नहीं वैश्विक महामारी फैलाने की क्षमता रखते हैं। ये वायरस बहुत कम समय में 3 कि.मी. से 400 कि.मी. तक की दूरी तक पहुंच जाते हैं। ये सूअर, घोड़े, कुत्ते, बिल्ली, पालतु मुर्गे-मुर्गियों, पालतु पक्षियों आदि के माध्यम से संक्रमण फैला सकते हैं। एच तथा एन एन्टीजन के ये वायरस विशेष रूप से पालतु जानवरों को अपना वाहक बना लेते हैं। और फिर आदमियों में जाकर जानलेवा उत्पात मचाते हैं।
वि.स्वा.सं. हालाकि दावा कर रहा है कि इस ÷बर्ड फ्लू' के टीके देर-सवेर बना लिए जाएंगे लेकिन वैज्ञानिक और विशेषज्ञ मानते हैं कि इसे तैयार करने में अभी वक्त लगेगा। वि.स्वा.सं. से जुड़े वैज्ञानिकों की मानें तो ‘बर्ड फ्लू’ के वायरस की सरंचना में तेजी से बदलाव के कारण इससे बचाव का टीका बनाने में दिक्कत आ रही है। यहां वैज्ञानिकों की यह भी आशंका है कि बर्ड फ्लू का वायरस सामान्य एन्फ्लूएन्जा से मिलकर कोई और नई जानलेवा बीमारी को भी जन्म दे सकता है। यह बीमारी इन्सान को हो सकती है। यदि ऐसा हुआ तो इसके परिणाम बेहद खतरनाक होंगे। अभी तक यह रोग मुर्गियों से दूसरे पक्षियों में ही हो रहा है लेकिन इसके मुर्गियों से आदमी में संक्रमण की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता।
इधर एशियाई देशों में सार्स, बर्ड फ्लू, इबोला वायरस, एन्थे्रक्स आदि रहस्यमय व नये घातक रोगों का आतंक कुछ ज्यादा ही चर्चा में है। ये रोग महज बीमारी फैलाकर लोगों को मारते ही नहीं बल्कि वहां की अर्थ व्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित करते हैं। सन् 2003 में फैले ‘सार्स के आतंक’ ने एशियाई देशों के कोई 30 अरब डालर का नुकसान पहुंचाया था। सन् 2004 में बर्ड फ्लू के आतंक ने थाइलैण्ड की अर्थ व्यवस्था को धूल चटा दिया था, जबकि उस वर्ष बर्ड फ्लू के 17 मामलों में वहां 12 मृत्यु दर्ज हुई थी। धीरे-धीरे भारत में भी मुर्गी पालन एक बड़े लघु उद्योग के रूप में उभर रहा है। ऐसे में बर्ड फ्लू का आतंक यहां कैसा कहर बरपा सकता है इसका अन्दाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बाद दुनिया में कुछ खास प्रकार की बीमारियों का जिक्र ज्यादा होने लगा है। भारत में अब कई ऐसे रोग अब मुख्य चर्चा में है लेकिन अर्न्तराष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा इसे बेहद खतरनाक बीमारी बताया गया है। यहां पहले से ही व्याप्त मलेरिया, कालाजार, टी.बी., डायरिया आदि के खतरनाक होते जाने की उतनी चर्चा नहीं होती जितनी इन अर्न्तराष्ट्रीय रोगों की हो रही है। एच.आई.वी./एड्स या हिपेटाइटिस-बी जैसे रोग ही देश के स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा डकार जाते हैं। जबकि इन रोगों का स्थाई उपचार अभी तक ढूढ़ा नहीं जा सका है। वैश्वीकरण के दौर की महामारियों को देखें तो इन रोगों के लक्षण और उपचार यों तो अलग-अलग हैं लेकिन एक बात सब में समान है। वह है- इनका अर्न्तराष्ट्रीय खौफ और प्रचार। कोई 13 वर्ष पूर्व जब गुजरात के सूरत में अचानक प्लेग का आतंक फैला था तब ऐसी अफरा-तफरी मची थी कि भारत का ‘मैनचेस्टर’ कहा जाने वाला ‘सूरत’ बेरौनक हो गया था। कोई चार लाख लोग (लगभग दो तिहाई आबादी) कुछ ही दिनों में सूरत छोड़ कर भाग खड़े हुए थे। करोड़ों को कारोबार चौपट हो गया था।
‘सार्स’ ने चीन की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया था। बर्ड फ्लू ने थाइलैण्ड को हिलाया। वियतनाम तो वैसे ही मृतप्राय है। इराक, अफगानिस्तान, इण्डोनेशिया सब कुछ न कुछ ‘रहस्यमय’ व ‘घातक’ बीमारियों की चपेट में हैं। समझा जाना चाहिए कि जब देशों की अर्थव्यवस्था वैश्विक हो रही तो वैश्विक महामारियों से भला कैसे बचे रहा जा सकता है। इससे उलट भारत में मलेरिया टी.बी. कालाजार दिमागी बुखार आदि ऐसे रोग हैं जिन्हें वैश्वीकरण के दौर में ज्यादा तरजीह नहीं दी जा रही। जबकि इन रोगों से होने वाली इन्सानी मौतें लाखों में है। मलेलिया को ही ले तो इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश अफ्रीका में प्रति वर्ष 7 लाख बच्चे इसके चपेट में आते हैं। लेकिन एच.आई.वी. के दहशत ने वहां मलेरिया को नजर अन्दाज कर दिया है।
अब सवाल है कि इन अर्न्तराष्ट्रीय रोगों का उपचार क्या है? जाहिर है इन रहस्यमय रोगों के रहस्यमयी उपचार का ‘सीक्रेट’ दुनिया के चन्द शक्तिशाली दवा कम्पनियों के पास ही है और उनके पास इन दवाओं पर एकाधिकार भी है। इन कम्पनियों ने तीसरी दुनिया कहे जाने वाले देशों के पेटेन्ट कानून को अपने फायदे के लिए बदलवा भी लिया है। पोलियों को ही देखें तो 10 हजार करोड़ों से भी ज्यादा रुपये खर्च कर हम पोलियों से भारत को मुक्त नहीं करा पाए हैं। बल्कि पोलियों की स्थिति और खतरनाक होती जा रही है। क्योंकि पोलियो के वायरस खतरनाक स्वरूप ग्रहण कर रहे हैं। यहां यह याद रखना चाहिए कि पोलियो उन्मुलन का हम अर्न्तराष्ट्रीय फार्मूला ही प्रयोग कर रहे हैं। यह भी प्रश्न है कि इन ग्लोबल बीमारियों की सही दवा कैसे ढूढ़ी जाए? देश के कर्णधारों व योजनाकारों को यह समझना होगा। इन कथित रोगों की असली दवा तलाशनी होगी। अमीर देशों के हथकण्डे और ग्लोबल रोगों के आपसी रिश्ते को समझना होगा। जब तक रोग के सही कारण का पता नहीं लग जाता तब तक सही उपचार नहीं किया जा सकता। बर्ड फ्लू से डरने की बजाय उसका मुकाबला किया जाना चाहिए। यह जानलेवा रोग जरूर है लेकिन लाइलाज नहीं।
(लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त चिकित्सक एवं जन स्वास्थ्य वैज्ञानिक हैं।)
Wednesday, February 6, 2008
Monday, February 4, 2008
साक्षी स्कूल जा रहा है
...............-सरोज कुमार वर्मा
पीठ पर बस्ते का पहाड़
और वाटर-बॉटल में चुल्लू भर समंदर लिये
साक्षी स्कूल जा रहा है।
जूते काट रहे हैं पांव
गरदन कस रही है टाई
पीछे लदी किताब-कॉपियों के कारण
बैलेंस बनाये रखने की कोशिश में
आगे झुकी-झुकी दुख रही है कमर
मगर इन सब के बावजूद
साक्षी तेज-तेज कदमों से
स्कूल जा रहा है
कि देर हो जाने पर
क्लास से बाहर रहना पड़ेगा
या भरना पड़ेगा जुर्माना।
साक्षी ने आज होमवर्क नहीं किया
कल आई थी बुआ की बेटी झिलमिल
वह उसी के साथ खेलते-खेलते सो गया था
पर अभी स्कूल जाते
कांप रहा है उसका मन
कि इंग्लिश वाले सर
बड़ी बेरहमी से पीटते हैं।
साक्षी कभी-कभी स्कूल जाना नहीं चाहता
वह तितलियों के पीछे भागना चाहता है
उड़ाना चाहता है पतंग
खरगोश के बच्चे के साथ खेलना चाहता है
और चाहता है बाबा के पास गांव चला जाना
मगर उसे छुट्टियां नहीं मिलती।
पापा कहते हैं – पढ़ो बेटा! खूब पढ़ो
तुम्हें कलक्टर बनना है
मम्मी कहती है – नहीं। डॉक्टर;
मगर साक्षी से कोई नहीं पूछता
वह क्या बनना चाहता है?
उसे पसंद है चित्र बनाना
गीत गाना और बजाना वायलिन।
लेकिन साक्षी क्या करे?
कहां फेंक आये पीठ पर लदा पहाड़?
कैसे खोले गरदन कसी टाई की गांठ?
आसमान में उड़ते पंछियों को देखकर
सड़क पर लगे माइल-स्टोन होने से
खुद को कैसे बचाये
सोचता हुआ साक्षी स्कूल जा रहा है।
पीठ पर बस्ते का पहाड़
और वाटर-बॉटल में चुल्लू भर समंदर लिये
साक्षी स्कूल जा रहा है।
जूते काट रहे हैं पांव
गरदन कस रही है टाई
पीछे लदी किताब-कॉपियों के कारण
बैलेंस बनाये रखने की कोशिश में
आगे झुकी-झुकी दुख रही है कमर
मगर इन सब के बावजूद
साक्षी तेज-तेज कदमों से
स्कूल जा रहा है
कि देर हो जाने पर
क्लास से बाहर रहना पड़ेगा
या भरना पड़ेगा जुर्माना।
साक्षी ने आज होमवर्क नहीं किया
कल आई थी बुआ की बेटी झिलमिल
वह उसी के साथ खेलते-खेलते सो गया था
पर अभी स्कूल जाते
कांप रहा है उसका मन
कि इंग्लिश वाले सर
बड़ी बेरहमी से पीटते हैं।
साक्षी कभी-कभी स्कूल जाना नहीं चाहता
वह तितलियों के पीछे भागना चाहता है
उड़ाना चाहता है पतंग
खरगोश के बच्चे के साथ खेलना चाहता है
और चाहता है बाबा के पास गांव चला जाना
मगर उसे छुट्टियां नहीं मिलती।
पापा कहते हैं – पढ़ो बेटा! खूब पढ़ो
तुम्हें कलक्टर बनना है
मम्मी कहती है – नहीं। डॉक्टर;
मगर साक्षी से कोई नहीं पूछता
वह क्या बनना चाहता है?
उसे पसंद है चित्र बनाना
गीत गाना और बजाना वायलिन।
लेकिन साक्षी क्या करे?
कहां फेंक आये पीठ पर लदा पहाड़?
कैसे खोले गरदन कसी टाई की गांठ?
आसमान में उड़ते पंछियों को देखकर
सड़क पर लगे माइल-स्टोन होने से
खुद को कैसे बचाये
सोचता हुआ साक्षी स्कूल जा रहा है।
Monday, January 28, 2008
मौसम के उतार-चढ़ाव से परिंदे भी हैरान
ठंड से लौटी कीठम पक्षी विहार में चहचहाहट
- सन्मय प्रकाश ......
मौसम के उतार चढ़ाव ने मनुष्यों ही नहीं, प्रवासी पक्षी को भी हैरान कर दिया है। उड़ान भर चुके
चालीस हजार पक्षियों ने सफर स्थगित कर वापस आगरा के कीठम पक्षी विहार में डेरा डाल लिया। एक बार फिर एक लाख परिंदों की चहचहाहट से कीठम गूंज उठा है। दरअसल, दस दिन पहले हुई हल्की गर्मी ने प्रवासी पक्षियों को सर्दी का मौसम खत्म होने का आभास दिलाया था। इस दौरान उन्होंने जमकर भोजन किया और ऊर्जा बढ़ा ली। इसके बाद वे अपने-अपने वतन की ओर रवाना हो गये। तापमान गिरते ही परिंदों को मौसम की असलियत का अंदाजा हुआ और वापस कीठम लौट गये।
चालीस हजार पक्षियों ने सफर स्थगित कर वापस आगरा के कीठम पक्षी विहार में डेरा डाल लिया। एक बार फिर एक लाख परिंदों की चहचहाहट से कीठम गूंज उठा है। दरअसल, दस दिन पहले हुई हल्की गर्मी ने प्रवासी पक्षियों को सर्दी का मौसम खत्म होने का आभास दिलाया था। इस दौरान उन्होंने जमकर भोजन किया और ऊर्जा बढ़ा ली। इसके बाद वे अपने-अपने वतन की ओर रवाना हो गये। तापमान गिरते ही परिंदों को मौसम की असलियत का अंदाजा हुआ और वापस कीठम लौट गये।कीठम पक्षी विहार में आमतौर पर लद्दाख, चीन, बर्मा, साइबेरिया आदि ठंडे देशों से ही प्रवासी परिंदे आते हैं। उन देशों में इस वक्त बर्फ पड़ने लगती है। खाने की समस्या की वजह से पक्षी हजारों किलोमीटर की यात्रा कर पक्षी विहार में डेरा डालते हैं। फरवरी की समाप्ति के साथ ही उनकी वापसी शुरू हो जाती है। लेकिन ग्लोबल वार्मिग ने मौसम के चक्र में जबरदस्त असर डाला है। इस बार सर्दी के मौसम में भी काफी दिनों तक गर्मी का अहसास हुआ। ऐसी स्थिति से परिंदे अछूते न रह सके। जिस प्रकार मनुष्यों ने दस दिन पहले गर्म कपड़ों की पैकिंग कर दी थी। लोगों ने सोचा कि सर्दी अब खत्म हो गई। प्रवासी पक्षियों ने भी ऐसा ही महसूस किया। उन्हें लगा कि आगरा में गर्मी शुरू होने का मतलब है कि उनके वतन में भी सर्दी में कमी आई है। वन विभाग के रेंज ऑफिसर आरबी उत्तम के अनुसार उड़ान भरने से पहले पक्षी अपनी ऊर्जा बढ़ाते हैं। पक्षी कुछ दिनों तक खूब भोजन करते हैं और अपना वजन बढ़ाते हैं। अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार विभिन्न प्रजाति के पक्षी एक बार में सौ से हजार किलोमीटर की यात्रा करते हैं। चालीस हजार परिंदों ने उड़ान भरी और दो दिन बाद ही भीषण सर्दी शुरू हो गई। इसके बाद सभी ने यात्रा स्थगित कर दी। रास्ते में कहीं जल क्षेत्र न मिलने की वजह से कीठम में ही वापस आकर डेरा डालना पड़ा।
मौसम का जबरदस्त असर पक्षियों पर होता है। आधुनिकता में लोगों ने घरों के आस-पास के पक्षियों के आशियाने को खत्म कर दिया है। ताला या झरना नगन्य हो चुके हैं। इस वजह से पक्षियों को खाने-पीने की समस्या उत्पन्न हो गई है। मैना, बुलबुल, गौरैया, रौबिन के समान प्रवासी पक्षियों को पक्षी विहार के अलावा कोई जगह रुकने का नहीं बचा। ऐसी स्थिति में परिंदों को सौ से डेढ़ सौ किलोमीटर की यात्रा रोककर वापस लौटना पड़ा।
Tuesday, January 22, 2008
जाये तो कहां जाये कामगार जमात
-अनिल प्रकाश............
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिये प्रवासन का सिलसिला नया नहीं है। अंग्रेज यहां के लोगों को बहला-फुसलाकर गिरमिटिया मजदूर के रूप में मारिशस, फिजी, सूरीनाम ले गये थे, जहां कोड़े मार-मार कर उनसे गन्ने के खेतों में काम करवाया जाता था। समय का चक्र बदला, अंग्रेज वहां से चले गये और आज गिरमिटियों की संतानें खुशहाली में जी रही हैं। यहां के श्रमिकों को असम के चाय बगानों में भी ले जाया गया था। तब से वहां जाने का सिलसिला शुरू हुआ। ईंट के भट्ठों में, रिक्शे ठेले में जुते हुए, दुकानों में काम करने वाले, गाय-भैंस पालकर दूध बेचने वाले तथा भवन निर्माण और सड़क बनाने के काम में लगे लोग मुख्यत: इसी इलाके के हैं। यहां के लोग देश के उन इलाकों में भी अपना पसीना बहाते हैं, जहां रेलें नहीं जातीं। करगिर की बर्फीली पहाडि़यों पर, मणिपुर नागालैंड और सिक्किम की घाटियों और जंगलों में, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के खेतों में, केरल के नारियल-रबर के बगानों में, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, गुजरात के समुद्र तटों और अंडमान तक हाड़-तोड़ मेहतन करके वहां की समृद्धि बढ़ाने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग हर जगह मिल जाते हैं। लेकिन आज उन्हें प्रताडि़त और अपमानित होना पड़ रहा है। असम के अलगाववादी सशस्त्र गुटों के हाथों ये सीधे-साधे लोग मारे जाते हैं। परिणामत: लगभग एक लाख लोग वहां से भाग कर वापस आ गये हैं। अभी अहमदनगर और नासिक में इन्हें पीटा गया। महानगर के सौंदर्यीकरण के नाम पर स्लम्स में बसे लोगों को बार-बार उजाड़ा जाता है।
यहां के पढ़े-लिखे युवा जब काम की तलाश में, नौकरी आदि के लिए अन्य राज्यों की ओर रुख करते हैं तो बहुधा उन्हें अपमानित होना पड़ता है। शिवसेना वालों ने कई बार बिहारी नौजवानों को पीटा। उड़ीसा में भी इस प्रकार की कई घटनाएं हो चुकी हैं। दिल्ली की एक तिहाई से ज्यादा आबादी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से गये लोगों की है। लेकिन दिल्ली में बिहारी शब्द एक गाली है। मुम्बई में यहां के कामगारों के लिये हिकारत से ‘भैया’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।
बाल ठाकरे और शिव सेना का नस्ली दृष्टिकोण तो जगजाहिर है लेकिन दिल्ली में अनिवार्य पहचान पत्र के बहाने यहां के लोगों को खदेड़ने की उच्चस्तरीय साजिश और उसके पूर्व शीला दीक्षित के अनर्गल बयान उनके संकीर्ण दृष्टिकोण को परिलक्षित करते हैं। दिल्ली अगर देश की राजनीतिक राजधानी और मुम्बई आर्थिक राजधनी है तो वहां जाने, काम करने और बसने का हक सभी देशवासियों को है। जब देश की आर्थिक नीति ऐसी है कि सारी प्रगति कुछ महानगरों और थोड़े से राज्यों तक सिमटी हो तथा ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य इलाके कंगाली, भूख और गरीबी के अंधकार में डूबे हों तो लोग रोजी-रोटी की तलाश में समृद्ध इलाकों की तरफ जायेंगे ही। बिहारी श्रमिक अपनी कमाई से बचाकर जो पैसा अपने गांव भेजते रहे हैं उसके कारण बिहार के आर्थिक जीवन में, बाजार में चहल-पहल दिखती हैं। बाहर से आनेवाले इस पैसे ने बिहारी समाज के ढ़ांचे और सामाजिक संबंधों में बड़ा सकारात्मक बदलाव ला दिया था। प्रवासी श्रमिकों ने रेहन में रखी अपनी जमीन छुड़ाई, महाजन का कर्जा चुकाया और थोड़ी-थोड़ी जमीन भी खरीदी और मालिक के आसरे पर निर्भर उनकी इज्जत और उनका जीवन मुक्ति की ओर अग्रसर हुआ था। लेकिन 1990 के बाद से जैसे-जैसे उदारीकरण वाली नीतियां आगे बढ़ीं देश में हर जगह रोजगार के अवसर घटते गये। हरियाणा और पंजाब में काफी बड़े कृषि भू-भाग की मिट्टी में क्षारीयता बहुत हो गयी है। रासायनिक खादों, कीटनाशकों और सिंचाई के अत्यधिक प्रयोग के कारण न केवल भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, बल्कि कृषि उपज भी घटने लगी है। वहां के खेतों में फसल कटाई-दौनी के लिए बड़े-बड़े हार्वेस्टर कम्ब्राइन आ गये हैं। इन कारणों से वहां के कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की जरूरत घट गयी है। देश के अन्य राज्यों में भी कृषि क्षेत्र की हालत खराब हो गयी है। सबसे उन्नत माने जाने वाले आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पंजाब में ही किसानों ने सर्वाधिक आत्महत्याएं की हैं और कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश में तो 77 प्रतिशत ग्रामीण गरीब हैं (स्रोत-एनएसएसओ)। औद्योगिक क्षेत्रों में पार्ट पुर्जों के सस्ते आयात और अत्याधुनिक टेक्नालाजी के प्रवेश के कारण देशभर में लाखों छोटे-छोटे कारखाने और एंसिलियरी इकाइयां बंद हैं। ‘स्पेशल इकॉनोमिक जोन’ बनाये जाने के कारण भी लाखों किसान मजदूर उजड़ रहे हैं और बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हाते जा रहे हैं। यह समझना भूल होगी कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से या इंफॉर्मेशन टेक्नालाजी के विकास से गरीबी दूर होती है। हां इससे देश के पांच प्रतिशत लोगों की समृद्धि अत्यधिक बढ़ी है। इसके अतिरिक्त भी 10-15 प्रतिशत लोगों को कुछ नये प्रकार के काम मिले हैं लेकिन शेष आबादी बहुत बुरी हालत में है। राष्ट्रीय असंगठित क्षेत्र आयोग की 1997 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 83 करोड़ 60 लाख आबादी घोर गरीबी में रहती है। इनकी प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति खपत 20 रुपये से भी कम है। लगभग 20 करोड़ लोग तो 10 रुपये प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा करते हैं। तबाह होते कृषि क्षेत्र में अभी भी 65 प्रतिशत लोग हैं। औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार नहीं बढ़ रहा है। सेवा क्षेत्र की तेज प्रगति के बावजूद उसमें रोजगार बहुत कम है। राष्ट्रीय आय वृद्धि भले ही 8-9 प्रतिशत हो जाये लेकिन विषमता बढ़ती गयी और लोगों की बेरोजगारी और गरीबी का सिलसिला जारी रहा। ऐसे में जब बेरोजगारों और गरीबी का सिलसिला जारी रहा। ऐसे में जब बेरोजगार युवा या श्रमिक समृद्ध शहरों में पहुंचते हैं तो स्थानीय लोगों को लगता है कि वे उनका हक मारने आये हैं। इन परिस्थितियों में ही शिवसेना जैसे संगठनों को स्थानीय लोगों में आंचलिक असहिष्णुता भड़काने का मौका मिल जाता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दुनिया की सबसे उर्वर भूमि है, विस्तृत बाजार और पूंजी भी मौजूद है, लेकिन गलत आर्थिक नीतियों और निकम्मेपन के कारण यहां का स्वाभाविक विकास बाधित है।
बैंकों में जमा अधिकांश पैसा बाहर चला जाता है। यहां के किसान और स्थानीय कारोबारियों को पांच प्रतिशत सैकड़ा/महीना सूद पर महाजनों से पूंजी लेनी पड़ती है। यही कारण है कि फलों, सब्जियों के भरपूर उत्पादन के बावजूद छोटे-छोटे उद्योगों का जाल नहीं फैल सका। हाईटेक उद्योग लगाने के लिए एनआरआई या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से रोजगार का सृजन नहीं होगा। वे आ भी नहीं रही हैं। अकेले गुड़-खांडसारी का उद्योग लाखों हाथों को रोजगार दे सकता है।
लेकिन इसको प्रोत्साहन तो दूर पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं। छोटे, कुटीर-लघु उद्योगों और कृषि के विकास से यहां के करोड़ों लोगों को सम्मानपूर्वक रोजगार मिल सकता है और उन्हें बार-बार की जिल्लत से बचाया जा सकता है।
(दैनिक जागरण के मुजफ्फरपुर संस्करण से साभार।)
बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों के लिये प्रवासन का सिलसिला नया नहीं है। अंग्रेज यहां के लोगों को बहला-फुसलाकर गिरमिटिया मजदूर के रूप में मारिशस, फिजी, सूरीनाम ले गये थे, जहां कोड़े मार-मार कर उनसे गन्ने के खेतों में काम करवाया जाता था। समय का चक्र बदला, अंग्रेज वहां से चले गये और आज गिरमिटियों की संतानें खुशहाली में जी रही हैं। यहां के श्रमिकों को असम के चाय बगानों में भी ले जाया गया था। तब से वहां जाने का सिलसिला शुरू हुआ। ईंट के भट्ठों में, रिक्शे ठेले में जुते हुए, दुकानों में काम करने वाले, गाय-भैंस पालकर दूध बेचने वाले तथा भवन निर्माण और सड़क बनाने के काम में लगे लोग मुख्यत: इसी इलाके के हैं। यहां के लोग देश के उन इलाकों में भी अपना पसीना बहाते हैं, जहां रेलें नहीं जातीं। करगिर की बर्फीली पहाडि़यों पर, मणिपुर नागालैंड और सिक्किम की घाटियों और जंगलों में, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के खेतों में, केरल के नारियल-रबर के बगानों में, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, गुजरात के समुद्र तटों और अंडमान तक हाड़-तोड़ मेहतन करके वहां की समृद्धि बढ़ाने वाले बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग हर जगह मिल जाते हैं। लेकिन आज उन्हें प्रताडि़त और अपमानित होना पड़ रहा है। असम के अलगाववादी सशस्त्र गुटों के हाथों ये सीधे-साधे लोग मारे जाते हैं। परिणामत: लगभग एक लाख लोग वहां से भाग कर वापस आ गये हैं। अभी अहमदनगर और नासिक में इन्हें पीटा गया। महानगर के सौंदर्यीकरण के नाम पर स्लम्स में बसे लोगों को बार-बार उजाड़ा जाता है।
यहां के पढ़े-लिखे युवा जब काम की तलाश में, नौकरी आदि के लिए अन्य राज्यों की ओर रुख करते हैं तो बहुधा उन्हें अपमानित होना पड़ता है। शिवसेना वालों ने कई बार बिहारी नौजवानों को पीटा। उड़ीसा में भी इस प्रकार की कई घटनाएं हो चुकी हैं। दिल्ली की एक तिहाई से ज्यादा आबादी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से गये लोगों की है। लेकिन दिल्ली में बिहारी शब्द एक गाली है। मुम्बई में यहां के कामगारों के लिये हिकारत से ‘भैया’ शब्द का प्रयोग किया जाता है।
बाल ठाकरे और शिव सेना का नस्ली दृष्टिकोण तो जगजाहिर है लेकिन दिल्ली में अनिवार्य पहचान पत्र के बहाने यहां के लोगों को खदेड़ने की उच्चस्तरीय साजिश और उसके पूर्व शीला दीक्षित के अनर्गल बयान उनके संकीर्ण दृष्टिकोण को परिलक्षित करते हैं। दिल्ली अगर देश की राजनीतिक राजधानी और मुम्बई आर्थिक राजधनी है तो वहां जाने, काम करने और बसने का हक सभी देशवासियों को है। जब देश की आर्थिक नीति ऐसी है कि सारी प्रगति कुछ महानगरों और थोड़े से राज्यों तक सिमटी हो तथा ग्रामीण क्षेत्रों और अन्य इलाके कंगाली, भूख और गरीबी के अंधकार में डूबे हों तो लोग रोजी-रोटी की तलाश में समृद्ध इलाकों की तरफ जायेंगे ही। बिहारी श्रमिक अपनी कमाई से बचाकर जो पैसा अपने गांव भेजते रहे हैं उसके कारण बिहार के आर्थिक जीवन में, बाजार में चहल-पहल दिखती हैं। बाहर से आनेवाले इस पैसे ने बिहारी समाज के ढ़ांचे और सामाजिक संबंधों में बड़ा सकारात्मक बदलाव ला दिया था। प्रवासी श्रमिकों ने रेहन में रखी अपनी जमीन छुड़ाई, महाजन का कर्जा चुकाया और थोड़ी-थोड़ी जमीन भी खरीदी और मालिक के आसरे पर निर्भर उनकी इज्जत और उनका जीवन मुक्ति की ओर अग्रसर हुआ था। लेकिन 1990 के बाद से जैसे-जैसे उदारीकरण वाली नीतियां आगे बढ़ीं देश में हर जगह रोजगार के अवसर घटते गये। हरियाणा और पंजाब में काफी बड़े कृषि भू-भाग की मिट्टी में क्षारीयता बहुत हो गयी है। रासायनिक खादों, कीटनाशकों और सिंचाई के अत्यधिक प्रयोग के कारण न केवल भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, बल्कि कृषि उपज भी घटने लगी है। वहां के खेतों में फसल कटाई-दौनी के लिए बड़े-बड़े हार्वेस्टर कम्ब्राइन आ गये हैं। इन कारणों से वहां के कृषि क्षेत्र में श्रमिकों की जरूरत घट गयी है। देश के अन्य राज्यों में भी कृषि क्षेत्र की हालत खराब हो गयी है। सबसे उन्नत माने जाने वाले आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और पंजाब में ही किसानों ने सर्वाधिक आत्महत्याएं की हैं और कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश में तो 77 प्रतिशत ग्रामीण गरीब हैं (स्रोत-एनएसएसओ)। औद्योगिक क्षेत्रों में पार्ट पुर्जों के सस्ते आयात और अत्याधुनिक टेक्नालाजी के प्रवेश के कारण देशभर में लाखों छोटे-छोटे कारखाने और एंसिलियरी इकाइयां बंद हैं। ‘स्पेशल इकॉनोमिक जोन’ बनाये जाने के कारण भी लाखों किसान मजदूर उजड़ रहे हैं और बेरोजगारों की भीड़ में शामिल हाते जा रहे हैं। यह समझना भूल होगी कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से या इंफॉर्मेशन टेक्नालाजी के विकास से गरीबी दूर होती है। हां इससे देश के पांच प्रतिशत लोगों की समृद्धि अत्यधिक बढ़ी है। इसके अतिरिक्त भी 10-15 प्रतिशत लोगों को कुछ नये प्रकार के काम मिले हैं लेकिन शेष आबादी बहुत बुरी हालत में है। राष्ट्रीय असंगठित क्षेत्र आयोग की 1997 की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 83 करोड़ 60 लाख आबादी घोर गरीबी में रहती है। इनकी प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति खपत 20 रुपये से भी कम है। लगभग 20 करोड़ लोग तो 10 रुपये प्रतिदिन से भी कम पर गुजारा करते हैं। तबाह होते कृषि क्षेत्र में अभी भी 65 प्रतिशत लोग हैं। औद्योगिक क्षेत्र में रोजगार नहीं बढ़ रहा है। सेवा क्षेत्र की तेज प्रगति के बावजूद उसमें रोजगार बहुत कम है। राष्ट्रीय आय वृद्धि भले ही 8-9 प्रतिशत हो जाये लेकिन विषमता बढ़ती गयी और लोगों की बेरोजगारी और गरीबी का सिलसिला जारी रहा। ऐसे में जब बेरोजगारों और गरीबी का सिलसिला जारी रहा। ऐसे में जब बेरोजगार युवा या श्रमिक समृद्ध शहरों में पहुंचते हैं तो स्थानीय लोगों को लगता है कि वे उनका हक मारने आये हैं। इन परिस्थितियों में ही शिवसेना जैसे संगठनों को स्थानीय लोगों में आंचलिक असहिष्णुता भड़काने का मौका मिल जाता है। बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में दुनिया की सबसे उर्वर भूमि है, विस्तृत बाजार और पूंजी भी मौजूद है, लेकिन गलत आर्थिक नीतियों और निकम्मेपन के कारण यहां का स्वाभाविक विकास बाधित है।
बैंकों में जमा अधिकांश पैसा बाहर चला जाता है। यहां के किसान और स्थानीय कारोबारियों को पांच प्रतिशत सैकड़ा/महीना सूद पर महाजनों से पूंजी लेनी पड़ती है। यही कारण है कि फलों, सब्जियों के भरपूर उत्पादन के बावजूद छोटे-छोटे उद्योगों का जाल नहीं फैल सका। हाईटेक उद्योग लगाने के लिए एनआरआई या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से रोजगार का सृजन नहीं होगा। वे आ भी नहीं रही हैं। अकेले गुड़-खांडसारी का उद्योग लाखों हाथों को रोजगार दे सकता है।
लेकिन इसको प्रोत्साहन तो दूर पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगे हुए हैं। छोटे, कुटीर-लघु उद्योगों और कृषि के विकास से यहां के करोड़ों लोगों को सम्मानपूर्वक रोजगार मिल सकता है और उन्हें बार-बार की जिल्लत से बचाया जा सकता है।
(दैनिक जागरण के मुजफ्फरपुर संस्करण से साभार।)
Friday, January 11, 2008
प्रदूषण की देन तिलपिया निगल गई यमुना की मछली
मथुरा से इटावा तक अब मांसाहारी तिलपिया का साम्राज्य ं
-सन्मय प्रकाश .....
प्रदूषण की देन तिलपिया ने यमुना में अन्य प्रजाति की मछलियों पर कहर बरपा दिया है। शरीर पर कांटे वाली इस मछली के कारण देसी मछलियों का अस्त्वि खतरे में पड़ गया है। यमुना से मछलियों
की 10 से अधिक प्रजातियां लुप्त हो चुकी हैं। जबरदस्त प्रदूषित जल में रहने वाली तिलपिया से कई खतरे को देखते हुये केन्द्र सरकार ने इसके पालन पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। यमुना और इससे निकलने वाली नहरों में केवल इसी का साम्राज्य है। सामान्य मछलियों प्रदूषण से तो खत्म हो रही है, दूसरी ओर दुश्मन तिलपिया उसकी जान ले रही है। मछली को पसंद न किये जाने से मछुआरे इसे पकड़ते भी नहीं हैं।
प्रदूषण की देन तिलपिया ने यमुना में अन्य प्रजाति की मछलियों पर कहर बरपा दिया है। शरीर पर कांटे वाली इस मछली के कारण देसी मछलियों का अस्त्वि खतरे में पड़ गया है। यमुना से मछलियों
मथुरा, आगरा और फिरोजाबाद से गुजर रही यमुना में केवल तिलपिया मछली ही देखने मिल रही हैं। अफ्रीका और पूर्व मध्य एशियाई देशों में पाई जाने वाली यह मछली अति प्रदूषित जल में भी जीवित रह सकती है। देसी मछलियां वर्ष में एक बार प्रजनन करती है, जबकि तिलपिया दो बार। दोगुनी गति से इसकी वृद्धि होती है। भारत में प्रतिबंध के बावजूद यमुना में इसके फैलने का कारण उत्तर प्रदेश का मत्स्य विभाग को समझ नहीं आ रहा है। माना जा रहा है कि किसी ने तालाब में इसे पाल हो और बरसात में वहां से बहकर यह नदी में आ गई। जबरदस्त प्रदूषण और तिलपिया के आक्रामक रुख से आगरा और इसके आस-पास के इलाकों से गुजर रही यमुना से रेहू, नैन, कतला, सिल्वर कार्प, ग्रास काल्प, चाइनीज कार्प, टैंगन, सुइया, लाची, सॉल, चिलवा और टेंगडि़या समेत कई प्रजाति की मछलियां लगभग विलुप्त हो चुकी हैं। मत्स्य विभाग के आगरा के निरीक्षक रघुवीर कुमार का कहना है कि तिलपिया के खाने से पेट के अल्सर का खतरा रहता है। स्वास्थ्य और काफी तेजी से प्रसार होने की वजह से ही केन्द्र सरकार ने इस मछली पर प्रतिबंध लगा दिया था।
मछुआरा चंदन और बंटू ने बताया कि उसके खाने के लिये मछली का संकट हो गया है। जाल फेंकने पर केवल तिलपिया ही पकड़ में आती है। इसे सावधानी से न पकड़ने पर कांटे से उंगलियां फट जाती हैं। इसका स्वाद भी अच्छा नहीं है। नदी से मछली को निकालने के बाद तीन-चार घंटे में ही गंद और सड़न शुरू हो जाती है। बाजार में तिलपिया पांच से दस रुपये किलोग्राम की दर से कोई खरीदने को तैयार नहीं होता है। जबकि देसी मछलियों की कीमत 45 से 70 रुपये तक है। प्रशासन से ठेका मिलने के बाद ठेकेदार भी परेशान हैं। पर्यावरण की दृष्टि से सबसे चिंताजनक बात है कि अगर इस मामले पर कोई कदम न उठाया गया तो मछली यमुना के माध्यम से इटावा पहुंचकर चंबल में फैल जायेगी। इसके बाद इलाहाबाद के संगम के माध्यम से गंगा तक चली जायेगी। गौरतलब है कि वर्ष 2007 में चार बार मछलियां प्रदूषण की वजह से मर चुकी है। लेकिन तिलपिया मछलियों की मौत ज्यादा संख्या में नहीं हुई। हां, देसी मछलियां जरूर खत्म हो गई।
(हिन्दुस्तान के आगरा संस्करण से साभार)
Sunday, December 9, 2007
नमक में ऑयोडीन से बिगड़ रही है सेहत
-सन्मय प्रकाश -
आम जनता की सेहत और गाढ़ी कमाई को सरकार ने आयोडीन नमक के नाम पर कंपनियों के सामने न्योछावर कर दिया है। नमक के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां जनता को धोखा दे रही हैं। संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पहली बार माना है कि फल, सब्जी, दूध, दही, मांस, मछली और पानी में आयोडीन की भरपूर मात्रा है। चिकित्सकों का कहना है कि इसके बाद भी नमक में जबरदस्ती आयोडीन खिलाने से हाइपो थाइरायड सहित कई बीमारियां हो रही हैं। लोगों को आयोडीन युक्त नमक नहीं खाना चाहिए।
आयोडीन की अधिकता से बीमारी होने के मामले को सांसद अली अनवर ने राज्सभा में सवाल उठाया था। पिछले सप्ताह केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण रार्यमंत्री पी लक्ष्मी ने जवाब देते हुए कहा है कि आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में हुए शोध में साबित हुआ है कि खाने की वस्तुओं में आयोडीन पर्याप्त मात्रा में है। आगरा में हाइपो थाइरायड के मरीजों की संत्रया बहुत र्यादा है। औसतन प्रत्येक घर के एक सदस्य को हाइपो थाइरायड की बीमारी है।
आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. एके गुप्ता का कहना है कि रिसर्च का दूसरा फेज अब शुरू होगा। अब तक के शोध से पता चला है कि जिन घरों में आयोडीन का प्रयोग होता है, वहां भी घेघा की बीमारी है। उनका कहना है कि आयोडीन के ज्यादा सेवन से शरीर में ट्राईआयडोथाइरोनीन, थायरॉक्चसीन हार्मोन बनना कम हो जाता है। जो बीमारी आयोडीन की कमी से होती है वही बीमारी इसकी अधिकता से हो जाती है। वे मरीजों को साधारण नमक या सेंधा नमक खाने की सलाह देते हैं। आगरा का लायर्स कालोनी, शास्त्रीपूरम के डावली कालोनी और किरावली के कुछ गांव उदाहरण हैं, आयोडीन की अधिकता से हो रही बीमारियों के। इन कालोनियों में सौ से अधिक परिवार हैं जिनके घर के सभी सदस्यों को थायरॉयड है।
दरअसल, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बाजार के कारण ही हर आम आदमी को आयोडीन नमक खिलाने का अभियान सरकार ने चला रखा है। एक रुपये का नमक दस रुपये में बेचा जा रहा है। केवल पहाड़ी इलाकों में खाद्य पदार्थ में आयोडीन की कमी पाई गई है। आयोडीन नमक केवल इन्हीं जगहों के लोगों को खिलाना चाहिए।
संसद में सरकार एक तरफ कहती है कि आयोडीन खाद्य पदार्थ में पूरी मात्रा में मिल रही है, लेकिन दूसरी ओर साधारण नमक पर प्रतिबंध भी लगा रखा है। डॉक्चटरों का कहना है कि नियम का अर्थ यह है कि लोगों को बिना आयोडीन वाला नमक कभी नहीं मिलेगा। आयोडीन की अधिकता से तमाम बीमारियों झेलनी ही होगी। इन बीमारियों से बचने का एक ही उपाय है सेंधा नमक का प्रयोग।
रासायनशास्त्र के प्रोफेसर डॉ.अशोक कुमार का कहना है कि साधारण नमक से आयोडाइर्ड नमक बनाने के दौरान रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इस दौरान आयरन, कैल्शियम, जिंक आदि बाहर निकाल जाता है। इसके ऊपर पोटाशियम आयोडाइड नामक रसायन डाला जाता है। इसका बड़ा नुकसान है ऑक्सीडाइजिंग एजेंट। इसकी वजह से शरीर में कुछ हार्मोन और एंजाइम आदि भी ऑक्सीडाइजिंग करने की प्रवृत्ति रखते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आयोडीन कितनी मात्रा में मिला है। भूजल में आयोडीन पूरी मात्रा में देश के मैदानी इलाकों में है।
आम जनता की सेहत और गाढ़ी कमाई को सरकार ने आयोडीन नमक के नाम पर कंपनियों के सामने न्योछावर कर दिया है। नमक के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां जनता को धोखा दे रही हैं। संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने पहली बार माना है कि फल, सब्जी, दूध, दही, मांस, मछली और पानी में आयोडीन की भरपूर मात्रा है। चिकित्सकों का कहना है कि इसके बाद भी नमक में जबरदस्ती आयोडीन खिलाने से हाइपो थाइरायड सहित कई बीमारियां हो रही हैं। लोगों को आयोडीन युक्त नमक नहीं खाना चाहिए।
आयोडीन की अधिकता से बीमारी होने के मामले को सांसद अली अनवर ने राज्सभा में सवाल उठाया था। पिछले सप्ताह केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण रार्यमंत्री पी लक्ष्मी ने जवाब देते हुए कहा है कि आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज में हुए शोध में साबित हुआ है कि खाने की वस्तुओं में आयोडीन पर्याप्त मात्रा में है। आगरा में हाइपो थाइरायड के मरीजों की संत्रया बहुत र्यादा है। औसतन प्रत्येक घर के एक सदस्य को हाइपो थाइरायड की बीमारी है।
आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. एके गुप्ता का कहना है कि रिसर्च का दूसरा फेज अब शुरू होगा। अब तक के शोध से पता चला है कि जिन घरों में आयोडीन का प्रयोग होता है, वहां भी घेघा की बीमारी है। उनका कहना है कि आयोडीन के ज्यादा सेवन से शरीर में ट्राईआयडोथाइरोनीन, थायरॉक्चसीन हार्मोन बनना कम हो जाता है। जो बीमारी आयोडीन की कमी से होती है वही बीमारी इसकी अधिकता से हो जाती है। वे मरीजों को साधारण नमक या सेंधा नमक खाने की सलाह देते हैं। आगरा का लायर्स कालोनी, शास्त्रीपूरम के डावली कालोनी और किरावली के कुछ गांव उदाहरण हैं, आयोडीन की अधिकता से हो रही बीमारियों के। इन कालोनियों में सौ से अधिक परिवार हैं जिनके घर के सभी सदस्यों को थायरॉयड है।
दरअसल, बहुराष्ट्रीय कंपनियों का बाजार के कारण ही हर आम आदमी को आयोडीन नमक खिलाने का अभियान सरकार ने चला रखा है। एक रुपये का नमक दस रुपये में बेचा जा रहा है। केवल पहाड़ी इलाकों में खाद्य पदार्थ में आयोडीन की कमी पाई गई है। आयोडीन नमक केवल इन्हीं जगहों के लोगों को खिलाना चाहिए।
संसद में सरकार एक तरफ कहती है कि आयोडीन खाद्य पदार्थ में पूरी मात्रा में मिल रही है, लेकिन दूसरी ओर साधारण नमक पर प्रतिबंध भी लगा रखा है। डॉक्चटरों का कहना है कि नियम का अर्थ यह है कि लोगों को बिना आयोडीन वाला नमक कभी नहीं मिलेगा। आयोडीन की अधिकता से तमाम बीमारियों झेलनी ही होगी। इन बीमारियों से बचने का एक ही उपाय है सेंधा नमक का प्रयोग।
रासायनशास्त्र के प्रोफेसर डॉ.अशोक कुमार का कहना है कि साधारण नमक से आयोडाइर्ड नमक बनाने के दौरान रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है। इस दौरान आयरन, कैल्शियम, जिंक आदि बाहर निकाल जाता है। इसके ऊपर पोटाशियम आयोडाइड नामक रसायन डाला जाता है। इसका बड़ा नुकसान है ऑक्सीडाइजिंग एजेंट। इसकी वजह से शरीर में कुछ हार्मोन और एंजाइम आदि भी ऑक्सीडाइजिंग करने की प्रवृत्ति रखते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आयोडीन कितनी मात्रा में मिला है। भूजल में आयोडीन पूरी मात्रा में देश के मैदानी इलाकों में है।
Thursday, December 6, 2007
मथुरा रिफाइनरी का सीवेज यमुना में डालने पर लगा प्रतिबंध
उत्तर प्रदेश सरकार ने मथुरा रिफाइनरी का सीवेज यमुना में डालने पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब इसके पानी का सम्पूर्ण उपयोग सिंचाई और भूजल रिचार्ज करने में किया जायेगा। प्रमुख सचिव, नगर विकास डीसी लाखा ने मथुरा में आलाधिकारियों की बैठक में यह फैसला सुनाया है। रिफाइनरी को इसके लिये विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बनाने का निर्देश दिया गया है। ताकि पानी का अन्य उपयोग हो सके। इस निर्णय से पर्यावरण प्रेमियों में खुशी की लहर दौड़ गई है।
गौरतलब है कि पिछले महीने मछलियों के मरने की घटना के बाद केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) और जल संस्थान की टीम ने रिफाइनरी की ड्रेन, बरारी में तैलीय पदार्थ की पड़त देखी थी। पहले से ही प्रदूषण की मार झेल रही यमुना को दोहरी मार झेलनी पड़ रही थी। तेल की पड़त की वजह से पानी में ऑक्सीजन बनने की प्रक्रिया में रुकावट आ जाती थी। इसकी वजह से नवम्बर महीने में कम से कम पांच बार हजारों की संख्या में मछलियां मर गई। रिपोर्ट का कहना था कि यमुना में इस तरह का ड्रेन जाना खतरे से खाली नहीं है। इसके बाद प्रमुख सचिव डीसी लाखा ने निर्देश दिया कि रिफाइनरी का सारा पानी (सीवेज) सिंचाई और अंडरग्राउंड वाटर रिचार्ज के लिये इस्तेमाल किया जाय। लेकिन इससे पहले लगातार कई दिनों तक रिफाइनरी से निकल रहे पानी की गहनता से जांच की जाय। अगर भूजल के रिचार्ज के लिये भी यह खतरनाक है तो किसी दूसरे तरीके से सीवेज का इस्तेमाल किया जाय। यह भी कहा गया है कि अगर पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं है तो इसे जानवरों के पीने के लिये भी इस्तेमाल में न लाया जाय।
गौरतलब है कि पिछले महीने मछलियों के मरने की घटना के बाद केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) और जल संस्थान की टीम ने रिफाइनरी की ड्रेन, बरारी में तैलीय पदार्थ की पड़त देखी थी। पहले से ही प्रदूषण की मार झेल रही यमुना को दोहरी मार झेलनी पड़ रही थी। तेल की पड़त की वजह से पानी में ऑक्सीजन बनने की प्रक्रिया में रुकावट आ जाती थी। इसकी वजह से नवम्बर महीने में कम से कम पांच बार हजारों की संख्या में मछलियां मर गई। रिपोर्ट का कहना था कि यमुना में इस तरह का ड्रेन जाना खतरे से खाली नहीं है। इसके बाद प्रमुख सचिव डीसी लाखा ने निर्देश दिया कि रिफाइनरी का सारा पानी (सीवेज) सिंचाई और अंडरग्राउंड वाटर रिचार्ज के लिये इस्तेमाल किया जाय। लेकिन इससे पहले लगातार कई दिनों तक रिफाइनरी से निकल रहे पानी की गहनता से जांच की जाय। अगर भूजल के रिचार्ज के लिये भी यह खतरनाक है तो किसी दूसरे तरीके से सीवेज का इस्तेमाल किया जाय। यह भी कहा गया है कि अगर पानी की गुणवत्ता ठीक नहीं है तो इसे जानवरों के पीने के लिये भी इस्तेमाल में न लाया जाय।
Tuesday, December 4, 2007
खतरे से खाली नहीं है ब्लड बैंक का रक्त चढ़वाना
बीमारी के दौरान जो रक्त आपको चढ़ाया जा रहा है, वह एड्स और हेपेटाइटिस बी तथा सी का कारण बन सकता है। यह जरूरी नहीं है कि ब्लड बैंक से मिल रहे रक्त में इन दोनों बीमारियों का वायरस बिल्ङुल ही न हों। आपके अपनों का खून भी आपके जीवन के लिए खतरनाक हो सकता है। विशेषड्टाों के अनुसार एचआईवी इंफेक्शन के छह महीने से छह साल तक जांच में वायरस का पता नहीं लगाया जा सकता है। ब्लड बैंक में रक्तदान करने वाले 50 प्रतिशत से अधिक नशेड़ी होते हैं। वे रुपये के लिये रक्तदान करते हैं। केवल पीसीआर जांच में ही वायरस की संख्या की जानकारी मिल सकती है। लेकिन यह जांच 99 फीसदी ब्लड बैंक में नहीं है।
साइंटिफिक पैथोलॉजी केन्द्र के डॉ. अशोक शर्मा का कहना है कि एचआईवी की जांच के अब कई तरीके आ चुके हैं। इसकी सेंसटिविटी र्यादा है, लेकिन एक हद तक ही। उनका कहना है कि इंफेक्शन के बाद शुरुआती स्तर पर एचआईवी की जांच में वायरस नजर नहीं आ सकता। लेकिन, गौर करने वाली बात यह है कि ब्लड में वायरस कितनी संख्या में हैं। शुरुआती स्टेज के मरीज का रक्त चढ़ाने के काफी समय के बाद मरीज में एड्स के लक्षण दिखेंगे। यही हाल मलेरिया पैरासाइट बीमारी का भी है। इसके भी वायरस रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर ही असर दिखाते हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज में भी इस मसले पर चिंता बढ़ गई है। एसएन मेडिकल ङङ्खॉलेज के प्राचार्य डॉ.एनसी प्रजापति का कहना है कि आम तौर पर एचआईवी पॉजिटिव होने की 83 प्रतिशत जानकारी किसी अन्य बीमारी के दौरान ही पकड़ में आती है। रक्त चढ़ाने से पहले पैकेट पर एचआईवी और हेपेटाइटिस बी व सी निगेटिव लिखा हुआ होना जरूर देख लेना चाहिए। इस वक्त एकमात्र यही विकल्प है। मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. बलबीर सिंह का कहना है कि एचआईवी वायरस के संङ्रमण के छह महीने से छह साल तक आदमी बिलङुल सामान्य स्थिति में रहता है। ऐसी स्थिति चालीस से पचास प्रतिशत लोगों में देखने को मिली है। मात्र पंद्रह प्रतिशत लोगों रोग प्रतिरोधक क्षमता में भारी कमी संक्रमण के एक साल बाद ही दिखने लगता है। यह संबंधित त्यक्ति में पहले की रोग प्रतिरोधक क्षमता, खान-पान और जीवन स्तर पर निर्भर करता है।
हेपेटाइटिस बी और सी उतनी ही खतरनाक है जितना एड्स। कई बार इंफेक्शन होने के बाद पीलिया, पेट में दर्द जी मचलाना लक्षण होते हैं और हल्के इलाज के बाद मरीज ठीक हो जाता है। इस दौरान कई बार पता नहीं चलता है कि हेपेटाइटिस बी या सी का वायरस शरीर में मौजूद है। लेकिन सात-आठ वर्षों बाद फिर पीलिया शुरू हो जाता है और पेट में पानी भर जाता है। ऐसी स्थिति में उसे बचाना खतरनाक होता है। यही स्थिति कुछ अन्य बीमारियों में भी होती है। एचआईवी का पता लगाने के लिये सीडी फोर और पीसीआर की जांच में कम से कम चार हजार रुपये का खर्चा आता है। यदि इन बीमारियों के प्रारंभिक लक्षण वाले मरीजों का खून किसी को चढ़ा दिया जाए तो उसे भी यह बीमारी होनी ही है।
साइंटिफिक पैथोलॉजी केन्द्र के डॉ. अशोक शर्मा का कहना है कि एचआईवी की जांच के अब कई तरीके आ चुके हैं। इसकी सेंसटिविटी र्यादा है, लेकिन एक हद तक ही। उनका कहना है कि इंफेक्शन के बाद शुरुआती स्तर पर एचआईवी की जांच में वायरस नजर नहीं आ सकता। लेकिन, गौर करने वाली बात यह है कि ब्लड में वायरस कितनी संख्या में हैं। शुरुआती स्टेज के मरीज का रक्त चढ़ाने के काफी समय के बाद मरीज में एड्स के लक्षण दिखेंगे। यही हाल मलेरिया पैरासाइट बीमारी का भी है। इसके भी वायरस रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर ही असर दिखाते हैं।
एसएन मेडिकल कॉलेज में भी इस मसले पर चिंता बढ़ गई है। एसएन मेडिकल ङङ्खॉलेज के प्राचार्य डॉ.एनसी प्रजापति का कहना है कि आम तौर पर एचआईवी पॉजिटिव होने की 83 प्रतिशत जानकारी किसी अन्य बीमारी के दौरान ही पकड़ में आती है। रक्त चढ़ाने से पहले पैकेट पर एचआईवी और हेपेटाइटिस बी व सी निगेटिव लिखा हुआ होना जरूर देख लेना चाहिए। इस वक्त एकमात्र यही विकल्प है। मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के डॉ. बलबीर सिंह का कहना है कि एचआईवी वायरस के संङ्रमण के छह महीने से छह साल तक आदमी बिलङुल सामान्य स्थिति में रहता है। ऐसी स्थिति चालीस से पचास प्रतिशत लोगों में देखने को मिली है। मात्र पंद्रह प्रतिशत लोगों रोग प्रतिरोधक क्षमता में भारी कमी संक्रमण के एक साल बाद ही दिखने लगता है। यह संबंधित त्यक्ति में पहले की रोग प्रतिरोधक क्षमता, खान-पान और जीवन स्तर पर निर्भर करता है।
हेपेटाइटिस बी और सी उतनी ही खतरनाक है जितना एड्स। कई बार इंफेक्शन होने के बाद पीलिया, पेट में दर्द जी मचलाना लक्षण होते हैं और हल्के इलाज के बाद मरीज ठीक हो जाता है। इस दौरान कई बार पता नहीं चलता है कि हेपेटाइटिस बी या सी का वायरस शरीर में मौजूद है। लेकिन सात-आठ वर्षों बाद फिर पीलिया शुरू हो जाता है और पेट में पानी भर जाता है। ऐसी स्थिति में उसे बचाना खतरनाक होता है। यही स्थिति कुछ अन्य बीमारियों में भी होती है। एचआईवी का पता लगाने के लिये सीडी फोर और पीसीआर की जांच में कम से कम चार हजार रुपये का खर्चा आता है। यदि इन बीमारियों के प्रारंभिक लक्षण वाले मरीजों का खून किसी को चढ़ा दिया जाए तो उसे भी यह बीमारी होनी ही है।
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